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कुछ मित्रों ने मुझे फिर से सुझाव भेजे कि आप हिन्दी सेंटर चलाते हैं तो सिर्फ हिन्दी में क्यों नहीं लिखते ? आप हिन्दी के आलवा अंग्रेजी और अन्य भाषा में भी क्यों लिखते हो ? इस बात पर मैं अपने विचार प्रकट करना चाहता हूँ।

मेरे द्वारा संचालित हिन्दी सेंटर का मकसद कोई आंदोलन की शुरुआत करना नहीं है और न ही लोगों को जबर्दस्ती समझाना हैकि आप अगर हिन्दी में बोलेंगे तभी राष्ट्रवादी कहलायेंगे। इसका मकसद बहुत ही सरल है।इसका मकसद हिन्दी और भारतीय भाषा और संस्कृति पर शोध को बढ़ावा देना है औरहिन्दी को विदेशी और अहिंदी भाषी लोगों तक पहुंचाना है और अगर इसके लिए अङ्ग्रेज़ी (जिसे हम चाहे माने या न माने) और अन्य भाषाओंका प्रयोग जरूरी है। याद रहे कोई अमेरीकन या कोई फ्रांसीसी आपसे हिन्दी में बात तभी करेगा जब आप उससे उसकी भाषा में बात करेंगे। सिर्फ हिन्दी में बात करके न हम हिन्दी की सीमा को छोटा कर रहे हैं बल्कि पूरी दुनिया में अपने आप को कुएं का मेढक घोषित कर रहे हैं और इससे दूसरे भाषा के साथ संवाद नहीं होता और हिन्दी सिर्फ हिन्दी भाषियों के बीच सीमित रह जाता है, और ऐसा करना कोई गौरव की बात नहीं। 

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एक लकड़हारे युवक की कहानी है। लकड़हारा काफी मेहनती था। वह दिन में अवकाश के समय भी काम करता रहता और उन बुज़ुर्ग लोगों से उसे शिकायत रहती कि वे दिन में कई बार कुछ न कुछ पीने और गप्प हांकने के लिए बेवजह काम रोक कर समय नष्ट करते हैं। जैसे जैसे समय बीतता गया, उस युवा ने गौर किया कि हालांकि वह निरंतर बिना रुके अवकाश के समय भी काम करता है और शायद ही कभी आराम करता हो, इसके बाबजूद बाकी के बुजुर्ग लोग उतने ही पेड़ काट रहे थे बल्कि कई बार तो उससे भी ज्यादा काट डालते थे। ऐसा लगता था कि वे बुजुर्ग उसी की भाँति अवकाश के समय भी काम करते रहे हों इसलिए उसने तय किया कि अगले दिन से अब वह और ज्यादा मेहनत से काम करेगा। दुर्भाग्य से इसका नतीजा और भी खराब निकला।

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बहुत ही दुखद स्थिति है कि विश्व पटल पर हिन्दी बोलने वालों की संख्या दूसरे या तीसरे स्थान पर हैं, लेकिन हिन्दी या कोई और भारतीय भाषा का ऑनलाइन प्रयोग करने वालों की संख्या बहुत ही कम है। क्या हम कभी इस डिजिटल विभाजन को दूर कर पाएंगे ?

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